उत्तर प्रदेश में पंचायत के चुनाव होने वाले थे, लेकिन सरकार पंचायत चुनावों को टल दिया और ग्राम प्रधानों प्रशासक बना दिया है। इस बीच, ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने के मामले में हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने राज्य निर्वाचन आयोग से पंचायत चुनाव की तिथि बताने के कहा है। इसके साथ ही राज्य सरकार को पिछड़ा वर्ग आरक्षण से जुड़ी आयोग की रिपोर्ट 10 जुलाई तक पेश करने के आदेश दिए हैं।
अब चुनाव की तिथि भी अगली सुनवाई पर बताने को कहा गया है। अदालत ने राज्य सरकार को भी पंचायत चुनाव के ध्यान रखते हुए गठित समर्थित अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट भी अगली सुनवाई पर 10 जुलाई को पेश करने का आदेश दिया है।
ग्राम प्रधानों का कार्यकाल पूरा होने वाला है
न्यायमूर्ति शेखर बी सराफ और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने बुधवार को यह आदेश ओमप्रकाश प्रजापति की जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद दिया। गौरतलब है कि हाल ही में प्रदेश की ग्राम पंचायतों के प्रधानों का कार्यकाल पूरा होने पर, राज्य सरकार ने आदेश जारी कर दिया है। वहां के प्रधानों को ही उनकी ग्राम पंचायतों में प्रशासक नियुक्त कर दिया है।
अब 3 जुलाई को होगी सुनवाई
याचिकाकर्ता ने इस फैसले को कानूनी प्रावधानों और विधायी उद्देश्य के विपरीत बताते हुए अदालत में चुनौती दी है। मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की तरफ से मामले पर 3 जून को विस्तृत सुनवाई किए जाने का अनुरोध किया गया था। इस पर अदालत ने याचिका को 3 जून की सुनवाई सूची में शामिल करने के निर्देश दिए। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी ने जानकारी दी कि बुधवार को अदालत ने राज्य निर्वाचन आयोग को पंचायत चुनाव की प्रस्तावित तिथि प्रस्तुत करने का निर्देश जारी किया है।
इतना ही नहीं, कोर्ट ने सरकार की इस दलील को नहीं माना कि ओबीसी आयोग 6 माह में रिपोर्ट देगा। कोर्ट ने राज्य सरकार को मामले की अगली सुनवाई पर 10 जुलाई को यह रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है।
असल में पंचायत चुनाव में सीटों के अरक्षण आदि के निर्धारण के लिए राज्य सरकार ने समर्थित पिछड़ा वर्ग आयोग गठित किया है, जो 6 माह अपनी रिपोर्ट पेश करनी होगी। हाईकोर्ट को सख्ती के बाद यूपी सरकार को ओबीसी आयोग की रिपोर्ट पेश करनी होगी। इसके साथ ही राज्य निर्वाचन आयोग को भी पंचायत चुनाव की तिथि कोर्ट को बतानी है।