इस समय कर्नाटक सरकार और राज्यपाल के बीच विधानसभा सत्र को लेकर चल रहे गतिरोध का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंचने वाला है। दरअसल, कर्नाटक के राज्यपाल ने सत्र के लिए तैयार किए गए भाषण में कुछ बातों पर आपत्ति जताई है। उन्हें इसे पक्षपातपूर्ण बताया और सत्र में शामिल न होने की धमकी दी है। सिद्धारमैया सरकार ने राज्यपाल को सुबह 11:15 बजे तक सत्र में आने का अल्टीमेटम दिया है। सरकार का कहना है कि राज्यपाल का सत्र छोड़ना संविधान के अनुच्छेद 176 (1) के तहत 'असंवैधानिक' होगा।
इस विवादित भाषण में 'जी. रामजी' के जिक्र और 'ठेकेदार-केंद्रित' कार्यक्रमों के आरोपों जैसी बातों पर अटका है। इतना ही नहीं, इन अनुच्छेदों में करों के बंटवारे, सिंचाई परियोजनाओं के लिए धन आवंटन और अन्य केंद्रीय योजनाओं में कर्नाटक के साथ कथित भेदभाव को भी उठाया गया है। सरकार के प्रतिनिधियों ने राज्यपाल से मिलकर बात करने की कोशिश की, लेकिन कोई हल नहीं निकला। अब राज्य सरकार इस संवैधानिक संकट को सुलझाने और विधायी कार्यवाही को जारी रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के पास जाने की तैयारी कर रहा है।
भाषण में बदलाव के लिए तैयार नहीं सरकार
कर्नाटक सरकार ने साफ कहा है कि वह राज्यपाल के अभिभाषण के मसौदे में किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं करेगी। सरकार का तर्क है कि यह अभिभाषण मंत्रिमंडल की स्वीकृति से तैयार किया गया है और इसमें पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार द्वारा कर्नाटक के साथ हुए भेदभाव को उजागर किया गया है। सरकार ने यह मसौदा सोमवार को राजभवन भेजा था, लेकिन बुधवार को राज्यपाल कार्यालय ने इसे यह कहते हुए वापस कर दिया कि इसमें मौजूद विवादित हिस्सों को हटाया जाए। बताया जा रहा है कि 100 से अधिक अनुच्छेदों वाले इस अभिभाषण में से 11 अनुच्छेदों पर राज्यपाल ने आपत्ति जताई है।
हालांकि, सीएम सिद्धारमैया ने कानून और संसदीय कार्य मंत्री एचके पाटिल के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल को राजभवन भेजकर राज्यपाल को अभिभाषण देने के लिए मनाने की कोशिश की, लेकिन राज्यपाल अपने रुख पर अडिग रहे।