बाटी-चोखा पर 'जंग': अखिलेश का BJP पर वार, 'संस्कृति' पर 'जाति' का तंज, CM योगी के गढ़ में सपा ने साधा निशाना

दिव्यांशी भदौरिया     Jan 02, 2026
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बाटी-चोखा पर जंग: अखिलेश का BJP पर वार, संस्कृति पर जाति का तंज, CM योगी के गढ़ में सपा ने साधा निशाना

उत्तर प्रदेश में बीजेपी की 'बाटी-चोखा' दावत पर नाराजगी और अखिलेश यादव की ग्रैंड दावत ने राजनीतिक सरगर्मी बढ़ा दी है। सपा की इस पहल को बीजेपी के ब्राह्मण नेताओं को साधने और सांस्कृतिक जुड़ाव बनाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।

इस समय उत्तर प्रदेश की राजनीति में जायके और जाति का एक अनोखा मेल देखने को मिल रहा है। नए साल के पहले दिन समाजवादी पार्टी के मुख्यालय में आयोजित 'बाटी-चोखा' की दावत ने राज्य में एक नई राजनीतिक चर्चा को जन्म दे दिया है। दरअसल, यह दावत सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी के भीतर चल रहे 'ब्राह्मण बनाम संगठन' विवाद पर कटाक्ष के रुप में देखी जा रही है।

क्या बोले अखिलेश यादव?

नववर्ष के मौके पर आयोजित इस भोज में शामिल कार्यकर्ताओं और जनता को संबोधित करते हुए अखिलेश यादव ने भाजपा पर जमकर निशाना साधा। अखिलेश यादव बोले- "बाटी-चोखा हमारे प्रदेश की संस्कृति का हिस्सा है, इसमें आपसी झगड़ों और राजनीति में बदनाम नहीं किया जाना चाहिए। सभी को बिना किसी पाबंदी के एक साथ बैठकर भोजन करना चाहिए"

बता दे किं, सपा प्रमुख का बयान भाजपा के उन ब्राह्मण विधायकों और विधान पार्षदों के समर्थन में माना जा रहा है, जिन्हें हाल ही में एक ऐसी ही दावत में शामिल होने के लिए अपनी ही पार्टी से चेतावनी मिली थी। सपा के सूत्रों के सूत्रों के मुताबिक, इस भोज का मकसद सत्तारुढ़ दल को यह संदेश देना था कि खाने-पीने और सामाजिक मेलेजोल पर किसी भी तरह की जातिगत बंदिश गलत है।

क्या है पूरा विवाद?

बता दें कि, इस राजनीतिक पहल की पृष्ठभूमि करीब एक सप्ताह पहले तैयार हो चुकी थी। उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने पार्टी के कई ब्राह्मण विधायकों और सांसदों को अनुशासन का पालन करने की सख्त हिदायत दी थी। दरअसल, ये नेता उत्तर प्रदेश और बिहार में लोकप्रिय पारंपरिक व्यंजन ‘बाटी-चोखा’ के नाम पर आयोजित एक सामूहिक भोज और बैठक में शामिल हुए थे। भाजपा नेतृत्व ने इस आयोजन को जाति आधारित गतिविधि और संगठनात्मक अनुशासन के विरुद्ध माना। हालांकि, पार्टी के पूर्व सांसद ब्रजभूषण शरण सिंह जैसे नेताओं ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा था कि जब खुद राजनीतिक दल जातीय सम्मेलन करते हैं, तो विधायकों के एक साथ बैठने पर आपत्ति क्यों जताई जा रही है।

राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, अखिलेश यादव ने ‘बाटी-चोखा’ के माध्यम से एक साथ दो राजनीतिक संदेश देने की रणनीति अपनाई है। एक ओर, भाजपा के भीतर संगठनात्मक ढांचे से नाखुश ब्राह्मण नेताओं के प्रति सहानुभूति दिखाकर समाजवादी पार्टी उन्हें अपने पाले में लाने का प्रयास कर रही है। दूसरी ओर, ‘बाटी-चोखा’ को पूर्वी उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान के रूप में सामने रखकर सपा खुद को आम जनता की परंपराओं के करीब और भाजपा को कठोर व जनभावनाओं से दूर दिखाने की कोशिश में जुटी है।