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UP Politics Analysis: बसपा की सियासी नर्सरी से ब्राह्मणों का पलायन, Satish Mishra पर टिकी Mayawati की उम्मीदें

By LSChunav | Aug 15, 2026

बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी का अस्तित्व बचाने के लिए एक बार फिर ब्राह्मणों पर दांव लगाने की तैयारी में हैं। लेकिन, पार्टी के कई कद्दावर ब्राह्मण नेता लगातार उनका साथ छोड़ते गए हैं। 
इस पर अंटू मिश्रा का निष्कासन इसकी ताजा कड़ी है। बीते एक दशक में कई ऐसे नेता बसपा से दूर हुए, जिन्होंने अपनी राजनीति का ककहरा हाथी पर सवार होकर सीखा था। इस बात पर कोई दोहराए नहीं है कि बसपा की सियासी नर्सरी कद्दावर ब्राह्मण नेताओं से खाली होती जा रही है।
वर्ष 2007 में बसपा ने बड़ी संख्या में ब्राह्मण नेताओं को चुनावी मैदान में उतारा था। करीब 80 से अधिक ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया गया, जिनमें 41 विधायक बनकर विधानसभा पहुंचे। बसपा की यह सोशल इंजीनियरिंग काफी सफल रही और बाद में दूसरे राजनीतिक दलों ने भी इसी रणनीति को अपनाया।
हालांकि, 2017 के विधानसभा चुनाव तक आते-आते कई ब्राह्मण नेताओं का बसपा से जुड़ाव कमजोर होने लगा। मौजूदा भाजपा सरकार के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक इसका बड़ा उदाहरण हैं। बसपा ने उन्हें सांसद बनाया था, लेकिन विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया। आगे चलकर उनका यह राजनीतिक फैसला उनके लिए काफी फायदेमंद साबित हुआ।

बता दें कि, पूर्व मंत्री नकुल दुबे ने 2022 में बसपा छोड़कर कांग्रेस की तरफ रुख किया। पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय (दिवंगत), रंगनाथ मिश्रा और  विनय शंकर तिवारी और उनका पूरा कुनबा भी बसपा से दूर चला गया है। पूर्व विधान परिषद सभापति गणेश शंकर पांडेय सहित सरकार में उच्च पद पाने वाले कई अन्य ब्राह्मण नेता भी समय के साथ दूसरी पार्टियों में चले गए।

वहीं, अंबेडकरनगर से बसपा सांसद व विधायक रहे राकेश पांडेय और उनके बेटे व बसपा सांसद रहे रितेश पांडेय भी पार्टी का साथ छोड़ गए हैं।

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अंटू मिश्रा समेत कई मुख्य ब्राह्मण नेताओं के अलग होने से बसपा की इस समुदाय को जोड़ने की मुहिम को झटका लगा। अब इसकी सारी जिम्मेदारी राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा के कंधों पर है। संगठन में सिर्फ मुख्य ब्राह्मण चेहरा रह गए हैं। जो कि लंबे समय से ब्राह्मण सम्मेलनों की अगुवाई करते रहते हैं। 
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